हिंदी story पार्ट -19
बीरबल की नियक्ति
एक बार बादशाह अकबर ने एक गाँव में अपना दरबार लगाया। उसी गाँव मे एक युवा ब्राह्मण किसान महेश दास भी रहता था। महेश ने बादशाह अकबर की घोषणा सुनी की उस कलाकार को बादशाह एक हज़ार स्वर्ण मुद्राए देंगे जो उनकी जीवंत तस्वीर बनाएगा।
निश्चित दिन पर बादशाह के दरबार मे कलाकारों की भीड़ लग गयी। हर किसी के हाथ मे बादशाह की ढकी हुई तस्वीर थी। हर कोई दरबार मे यह जानने को उत्सुक था कि एक हज़ार स्वर्ण मोहरों का इनाम किसे मिलता है।
अकबर एक ऊंचे आसन पर बैठे और एक के बाद एक कलाकारों कि तस्वीर देखते और अपने विचारों के साथ सभी तसवीरों को एक-एक कर मना करते गये और बोले यह एक दम वैसी नहीं है जैसा मैं अब हूं।
जब महेश कि बारी आयी जो कि बाद में बीरबल के नाम से प्रसिद्ध हुए, तब तक अकबर परेशान हो चुके थे और बोले क्या तुम भी बाकी सब कि तरह ही मेरी तस्वीर बना कर लाये हो? लेकिन महेश बिना किसी भय के शांत स्वर में बोला “मेरे बादशाह, अपने आपको इसमे देखिए और स्वयं को संतुष्ट कीजिए।”
आश्चर्य कि बात यह थी कि यह बादशाह कि कोई तस्वीर नहीं थी बल्कि महेश के वस्त्रों से निकला एक दर्पण था।
यह देख कर सभी एक स्वर मे बोले “यही है बादशाह कि उत्तम तस्वीर।”
अकबर ने महेश दास का सम्मान किया और उसे एक हज़ार स्वर्ण मोहरें उपहार स्वरूप दीं। बादशाह ने महेश को एक राजकीय मोहर अंगूठी दी और फ़तेहपुर सीकरी, अपनी राजधानी, मे आने का निमंत्रण दिया। यही महेश दास आगे चलकर अकबर के विस्वास पात्र बीरबल बने |
Moral of the Story – अपने ग्राहक को वह दें जो वह चाहता है तथा जिससे उसकी आवशयकता पूर्ण होती है। अकबर किसी कलाकार द्वारा अपना चित्रण नहीं चाहते थे बल्कि वास्तविकता चाहते थे, जो कि एक दर्पण ही दिखा सकता था।
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